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Ecclesiastes 5 - 6

Keep thy foot when thou goest to the house of God,and be more ready to hear, than to give the sacrifice of fools: for they consider not that they do evil. Be not rash with thy mouth, and let not thine heart be hasty to utter any thing before God: for God is in heaven, and thou upon earth: therefore let thy words be few. For a dream cometh through the multitude of business; and a fool's voice is known by multitude of words.

Ecclesiastes 5

5 Keep thy foot when thou goest to the house of God, and be more ready to hear, than to give the sacrifice of fools: for they consider not that they do evil.
2 Be not rash with thy mouth, and let not thine heart be hasty to utter any thing before God: for God is in heaven, and thou upon earth: therefore let thy words be few.
3 For a dream cometh through the multitude of business; and a fool's voice is known by multitude of words.
4 When thou vowest a vow unto God, defer not to pay it; for he hath no pleasure in fools: pay that which thou hast vowed.
5 Better is it that thou shouldest not vow, than that thou shouldest vow and not pay.
6 Suffer not thy mouth to cause thy flesh to sin; neither say thou before the angel, that it was an error: wherefore should God be angry at thy voice, and destroy the work of thine hands?
7 For in the multitude of dreams and many words there are also divers vanities: but fear thou God.
8 If thou seest the oppression of the poor, and violent perverting of judgment and justice in a province, marvel not at the matter: for he that is higher than the highest regardeth; and there be higher than they.
9 Moreover the profit of the earth is for all: the king himself is served by the field.
10 He that loveth silver shall not be satisfied with silver; nor he that loveth abundance with increase: this is also vanity.
11 When goods increase, they are increased that eat them: and what good is there to the owners thereof, saving the beholding of them with their eyes?
12 The sleep of a labouring man is sweet, whether he eat little or much: but the abundance of the rich will not suffer him to sleep.
13 There is a sore evil which I have seen under the sun, namely, riches kept for the owners thereof to their hurt.
14 But those riches perish by evil travail: and he begetteth a son, and there is nothing in his hand.
15 As he came forth of his mother's womb, naked shall he return to go as he came, and shall take nothing of his labour, which he may carry away in his hand.
16 And this also is a sore evil, that in all points as he came, so shall he go: and what profit hath he that hath laboured for the wind?
17 All his days also he eateth in darkness, and he hath much sorrow and wrath with his sickness.
18 Behold that which I have seen: it is good and comely for one to eat and to drink, and to enjoy the good of all his labour that he taketh under the sun all the days of his life, which God giveth him: for it is his portion.
19 Every man also to whom God hath given riches and wealth, and hath given him power to eat thereof, and to take his portion, and to rejoice in his labour; this is the gift of God.
20 For he shall not much remember the days of his life; because God answereth him in the joy of his heart.

Ecclesiastes 6

6 There is an evil which I have seen under the sun, and it is common among men:
2 A man to whom God hath given riches, wealth, and honour, so that he wanteth nothing for his soul of all that he desireth, yet God giveth him not power to eat thereof, but a stranger eateth it: this is vanity, and it is an evil disease.
3 If a man beget an hundred children, and live many years, so that the days of his years be many, and his soul be not filled with good, and also that he have no burial; I say, that an untimely birth is better than he.
4 For he cometh in with vanity, and departeth in darkness, and his name shall be covered with darkness.
5 Moreover he hath not seen the sun, nor known any thing: this hath more rest than the other.
6 Yea, though he live a thousand years twice told, yet hath he seen no good: do not all go to one place?
7 All the labour of man is for his mouth, and yet the appetite is not filled.
8 For what hath the wise more than the fool? what hath the poor, that knoweth to walk before the living?
9 Better is the sight of the eyes than the wandering of the desire: this is also vanity and vexation of spirit.
10 That which hath been is named already, and it is known that it is man: neither may he contend with him that is mightier than he.
11 Seeing there be many things that increase vanity, what is man the better?
12 For who knoweth what is good for man in this life, all the days of his vain life which he spendeth as a shadow? for who can tell a man what shall be after him under the sun?

India hindi

सभोपदेशक 5 - 6

5 जब तू परमेश्वर के भवन में जाए, तब सावधान रहना, और मूर्खों के बलिदान चढ़ाने से अधिक सुनने के लिए तत्पर रहना; क्योंकि वे नहीं जानते कि वे बुरा कर रहे हैं।

2 अपने मुँह से उतावली न करना, और अपने मन से परमेश्वर के साम्हने कोई बात कहने में उतावली न करना; क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में है, और तू पृथ्वी पर है; इसलिये तेरे वचन थोड़े हों।

3 क्योंकि स्वप्न बहुत कामों से आता है, और मूर्ख की वाणी बहुत बातों से पहचानी जाती है।

4 जब तू परमेश्वर से मन्नत माने, तो उसे पूरा करने में विलम्ब न करना; क्योंकि वह मूर्खों से प्रसन्न नहीं होता; जो मन्नत तू ने मानी है, उसे पूरा कर।

5 मन्नत मानकर उसे पूरा न करने से मन्नत न मानना ​​ही अच्छा है।

6 अपने मुँह से अपने शरीर को पाप न करने देना; और न स्वर्गदूत के सामने कहो कि यह भूल थी; परमेश्वर क्यों तेरी वाणी से क्रोधित होकर तेरे हाथ के काम को नष्ट करे?

7 क्योंकि स्वप्नों की अधिकता और बहुत सी बातों में भी अनेक व्यर्थ बातें होती हैं; परन्तु परमेश्वर का भय मानो।

8 यदि तुम किसी प्रान्त में निर्धनों पर अत्याचार और न्याय और इंसाफ को बिगड़ते हुए देखो, तो इस बात पर अचम्भा मत करना; क्योंकि जो ऊँचे से भी बड़ा है, वह देखता है; और उनसे भी ऊँचे हैं।

9 और भूमि का लाभ सबके लिए है; राजा स्वयं खेत से सेवा करता है।

10 जो चाँदी से प्रीति रखता है, वह चाँदी से तृप्त नहीं होता; और जो बहुतायत से प्रीति रखता है, वह वृद्धि से तृप्त नहीं होता; यह भी व्यर्थ है।

11 जब धन बढ़ता है, तो उसके खानेवाले भी बढ़ते हैं; और उसके स्वामियों को क्या लाभ, सिवाय इसके कि वे उसे अपनी आँखों से देखें?

12 मेहनत करनेवाले की नींद मीठी होती है, चाहे वह थोड़ा खाए या बहुत, परन्तु धनी का धन उसे सोने नहीं देता।

13 एक बड़ी बुराई है जो मैंने सूर्य के नीचे देखी है, अर्थात् धन जो उसके स्वामियों के लिए उनके नुकसान के लिए रखा जाता है।

14 परन्तु वह धन बुरी मेहनत से नाश हो जाता है: और वह एक पुत्र को जन्म देता है, परन्तु उसके हाथ में कुछ नहीं रहता।

15 जैसे वह अपनी माँ के गर्भ से निकला था, वैसे ही नंगा लौट जाएगा, और अपने परिश्रम का कुछ भी नहीं लेगा, जिसे वह अपने हाथ में ले जा सके।

16 और यह भी एक बड़ी बुराई है, कि वह सब बातों में जैसा आया था, वैसा ही जाएगा; और जो वायु के लिए परिश्रम करता है, उसे क्या लाभ?

17 वह अपने सारे जीवन अन्धकार में खाता है, और अपनी बीमारी के कारण उसे बहुत दुःख और क्रोध होता है।

18 देखो, जो मैंने देखा है: यह अच्छा और उचित है कि मनुष्य खाए-पीए और अपने सारे परिश्रम से जो वह धरती पर करता है, अपनी सारी ज़िंदगी जो परमेश्वर उसे देता है, आनन्दित रहे, क्योंकि यह उसका भाग है।
19 हर मनुष्य जिसे परमेश्वर ने धन-सम्पत्ति दी हो और उसे उससे खाने और अपना भाग लेने और अपने परिश्रम में आनन्दित होने की शक्ति दी हो; यह परमेश्वर का दान है।
20 क्योंकि वह अपने जीवन के दिनों को बहुत याद नहीं रखेगा; क्योंकि परमेश्वर उसके हृदय के आनन्द में उसे उत्तर देता है।

6 मैंने सूर्य के नीचे एक बुराई देखी है, और यह मनुष्यों में आम है:

2 एक आदमी जिसे परमेश्वर ने धन, सम्पत्ति और सम्मान दिया है, ताकि वह अपनी आत्मा के लिए जो कुछ भी चाहता है, उसमें से कुछ भी न चाहे, फिर भी परमेश्वर उसे खाने की शक्ति नहीं देता, लेकिन एक अजनबी उसे खा जाता है: यह व्यर्थ है, और यह एक बुरी बीमारी है।

3 यदि कोई आदमी सौ बच्चों को जन्म देता है, और बहुत साल तक जीवित रहता है, ताकि उसके वर्षों के दिन बहुत हों, और उसका मन भलाई से भरा न हो, और न ही उसका अंतिम संस्कार हो; मैं कहता हूँ, कि असमय जन्म उससे बेहतर है।

4 क्योंकि वह व्यर्थ के साथ आता है, और अंधकार में चला जाता है, और उसका नाम अंधकार से ढक #

जाएगा।

5 इसके अलावा उसने सूरज नहीं देखा, न ही कुछ जाना: इस दूसरे की तुलना में अधिक आराम है।

6 हाँ, चाहे वह दो बार एक हजार साल तक जीवित रहे, फिर भी उसने कोई अच्छाई नहीं देखी: क्या सभी एक ही स्थान पर नहीं जाते? 7 मनुष्य का सारा परिश्रम उसके मुँह के लिए है, फिर भी उसकी भूख नहीं मिटती।
8 क्योंकि मूर्ख से बुद्धिमान का क्या लाभ? और जो जीवतों के आगे चलना जानता है, वह निर्धन का क्या लाभ?
9 वासनाओं के भटकने से आँखों की दृष्टि उत्तम है; यह भी व्यर्थ और मन का क्लेश है।
10 जो हुआ है उसका नाम पहले ही रखा जा चुका है, और यह जाना जाता है कि वह मनुष्य है: और न ही वह उससे विवाद कर सकता है जो उससे अधिक शक्तिशाली है।
11 जब कि व्यर्थता बढ़ाने वाली बहुत सी बातें हैं, तो मनुष्य किस से बढ़कर है?
12 क्योंकि कौन जानता है कि इस जीवन में मनुष्य के लिए क्या अच्छा है, अपने व्यर्थ जीवन के सारे दिन जो वह छाया की नाईं बिताता है? क्योंकि मनुष्य को कौन बता सकता है कि उसके बाद सूर्य के नीचे क्या होगा?

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PSALM 117
O praise the Lord, all ye nations:praise him, all ye people. For his merciful kindness is great toward us:and the truth of the Lord endureth for ever.
Praise ye the Lord.

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For I testify unto every man that heareth the words of the prophecy of this book, If any man shall add unto these things, God shall add unto him the plagues that are written in this book: And if any man shall take away from the words of the book of this prophecy, God shall take away his part out of the book of life, and out of the holy city, and from the things which are written in this book. Revelations 22: 18 - 19

MISSION STATEMENT

 

Officially chosen and authorized by Jesus himself. I Stephen Hodgkiss am humbly chosen, clothed in salvation, trustworthy, devoted, committed, and set apart for God's good works and his glory In all robes of righteousness, truthfulness, grace and households of God's good faith. For we are his workmanship, created in Christ Jesus unto good works, which God hath before ordained that we should walk in them.  Ephesians 2: 10 I am the founder and managing director of an international company called Church of England Limited. I pray, finance, walk, work, help, build, teach, train, promote, and contract with like-minded others of all countries worldwide exclusively in Jesus' forthcoming loving purpose to fulfil my Abrahamic covenant assignment/calling he has personally placed on and over my life, I plead the blood of Jesus over all the enemies of the Universal Creator of Heaven and earth,  in God's good faith and according to the almighty father God's newly published online "WORD OF GOD". The Church of England Limited and its staff is against all forms of idolatry and rebuke it all back to the pits of hell. Church of England Limited is independent of any third-party mainstream paganistic religion, its government, and Sunday church parish services in all its known forms by the blood of Christ. Our divine platform is open to all inquiries. We have now been set apart for the exclusive official leadership of the KING of kings and LORD of lord's words or instruction upon his soon-to-come return to earth. In the mighty name of Jesus Amen

 

 

 

 

 

 

 

 

And we know that all things work together for good to them that love God,

to them who are the called according to his purpose. Romans 8: 28 

If God is for us who can go against us  Romans 8: 31 

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